Abstract
भारत की विविध भौगोलिक इकाइयों में राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र अपने कठोर भू-परिदृश्य, रेत के विस्तीर्ण धोरों, जलाभाव, सूखे और जीवन के संघर्षमय परिवेश के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। मरुस्थल की भौगोलिक परिस्थितियाँ केवल प्राकृतिक पर्यावरण तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे वहाँ के जन-जीवन, संस्कृति, भाषा, लोककला, संगीत और साहित्य पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। रेगिस्तान की यह भूमि एक ओर तो अभाव और विषमता की पीड़ा का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर लोकजीवन की जिजीविषा, आशा और संघर्ष की अमिट गाथा भी कहती है। यही कारण है कि मरु प्रदेश केवल भौगोलिक सत्ता नहीं है, बल्कि यह एक सजीव सांस्कृतिक इकाई और जीवन की अनवरत चेतना का परिचायक है।
हिंदी साहित्य में अनेक रचनाकारों ने मरुभूमि के यथार्थ को स्वर दिया है, किंतु कन्हैयालाल सेठिया और मणि मधुकर का योगदान इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन दोनों ने मरु प्रदेश के जीवन और संस्कृति को साहित्य के केंद्र में रखकर उसे व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक विमर्श से जोड़ा।
कन्हैयालाल सेठिया का काव्य मरुभूमि की पीड़ा का प्रामाणिक दस्तावेज है। उनकी प्रसिद्ध कविता “धरती धोरां री” में मरुस्थल के रेतीले विस्तार, वहाँ की सांस्कृतिक जीवटता और जीवन की संघर्षमय धारा का सजीव चित्रण मिलता है। सेठिया केवल पर्यावरणीय विषमताओं का ही उल्लेख नहीं करते, बल्कि वे मरु प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता, लोकगीतों, लोककथाओं और संघर्षशील जन-जीवन को भी अपने काव्य में उतारते हैं। उनका साहित्य इस तथ्य को उजागर करता है कि मरुस्थल केवल अभाव का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह जीवन के विविध आयामों को समझने और गढ़ने वाली एक समृद्ध भूमि भी है।
मणि मधुकर ने कथा-साहित्य के माध्यम से मरुभूमि का यथार्थ सामने रखा। उनकी कहानियों में रेगिस्तान की विकट परिस्थितियों का सजीव चित्रण है-जल के अभाव, भूख, अकाल और विस्थापन की पीड़ा के साथ-साथ मानवीय संबंधों की ऊष्मा, लोकसंस्कृति की जिजीविषा और संघर्षशील चेतना का भी समावेश मिलता है। मधुकर का साहित्य यह दर्शाता है कि मरुस्थलीय जीवन मात्र पीड़ा और अभाव का पर्याय नहीं है, बल्कि उसमें लोक-जीवन की जड़ों से जुड़ी हुई संस्कृति, मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों की गहन व्याख्या भी निहित है।
पर्यावरणीय दृष्टि से देखा जाए तो मरुस्थल की परिस्थितियाँ-अकाल, जल-संकट, वनस्पति और जीव-जंतु का संघर्ष, तथा जलवायु की कठोरता-दोनों रचनाकारों के साहित्य में बार-बार परिलक्षित होती हैं। ये परिस्थितियाँ न केवल प्राकृतिक परिवेश का यथार्थ प्रस्तुत करती हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी आकार देती हैं। इसी प्रकार सांस्कृतिक दृष्टि से मरु प्रदेश के लोकगीत, लोकनृत्य, रीति-रिवाज, धार्मिक आस्थाएँ और सामाजिक संगठन साहित्यकारों के यहाँ जीवन की सशक्त धारा के रूप में उभरते हैं।
इस प्रकार कन्हैयालाल सेठिया और मणि मधुकर दोनों के साहित्य में रेगिस्तान का यथार्थ केवल भौगोलिक चित्रण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसमें पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक संवेदना का अनूठा समन्वय मिलता है। उनके साहित्य में रेगिस्तान एक जीवंत चरित्र की भाँति उपस्थित है, जो पीड़ा और संघर्ष के साथ-साथ आशा, आस्था और जीवन-शक्ति का प्रतीक बनकर उभरता है।
वर्तमान समय में जब ‘इको-लिटरेचर’ और क्षेत्रीय साहित्यिक विमर्श की प्रवृत्तियाँ तेजी से विकसित हो रही हैं, तब मरु प्रदेश की पीड़ा और वहाँ की सांस्कृतिक संवेदनाएँ और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार सेठिया और मधुकर का साहित्य मरुस्थलीय जीवन का प्रतिनिधित्व करते हुए पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विमर्श की नई संभावनाएँ खोलता है।
Key word– पर्यावरण, कन्हैयालाल सेठिया, मणि मधुकर, मरु-प्रदेश, रेगिस्तान
