ग्रामीण पलायन की समस्या एवं उसके दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन (मानकुंवर मेरावी)

साराश

भारत के सुदूरवर्ती आदिवासी अंचलों में ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान की प्रासंगिकता तथा उसके सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रभावों का समग्र विश्लेषण करना है, विशेष संदर्भ छत्तीसगढ़ राज्य के कबीरधाम जिले के बोडला ब्लॉक का है। ऐतिहासिक रूप से विकास की मुख्यधारा से वंचित इन आदिवासी अंचलों में डिजिटल तकनीकों के विस्तार ने सूचना के लोकतंत्रीकरण को गति प्रदान की है, जिससे स्थानीय समुदायों की सहभागिता एवं जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कॉमन सर्विस सेंटर्स, मोबाइल कनेक्टिविटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रसार ने आदिवासी समुदायों के लिए बैंकिंग सेवाओं, शैक्षिक संसाधनों तथा सरकारी योजनाओं तक पहुँच को अधिक सरल, सुलभ और पारदर्शी बनाया है। विशेष रूप से ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ प्रणाली ने बिचौलियों की भूमिका को सीमित करते हुए लाभार्थियों को सीधे आर्थिक सहायता प्रदान की है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है और शासन प्रणाली में विश्वास बढ़ा है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ शासन के महत्वपूर्ण योजनाएं ई-सेवाएं उपलब्ध हुआ है, जिससे आदिवासी अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली है। लेकिन भौगोलिक विषमता, सीमित नेटवर्क उपलब्धता, बिजली की अनियमितता, भाषाई अवरोध तथा डिजिटल साक्षरता की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी डिजिटल समावेशन के मार्ग में बाधक बनी हुई हैं। अतः यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि आदिवासी सशक्तिकरण के लिए केवल डिजिटल अवसंरचना का विस्तार पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थानीय आवश्यकताओं, सांस्कृतिक संदर्भों एवं भाषाई विविधता के अनुरूप एक समावेशी, सुलभ और टिकाऊ डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का विकास अनिवार्य है।

विशिष्ट शब्द: डिजिटल इंडिया, आदिवासी सशक्तिकरण, डिजिटल अंतराल, ई-गवर्नेस, समावेशी विकास ।

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